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गणपति जी की जादुई कहानी

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गणपति जी की जादुई कहानी

by Guest · Watercolor · Ages 6–9 · 8 pages

भोर की नीली रोशनी में जंगल के पास छोटा गाँव जागने लगा। बीचों-बीच सुंदर मंदिर की घंटियाँ धीरे-धीरे झनकीं। तभी एक नन्हा मूषक चमकीली गेंदे की माला लुढ़काता हुआ भीतर आया।

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भोर की नीली रोशनी में जंगल के पास छोटा गाँव जागने लगा। बीचों-बीच सुंदर मंदिर की घंटियाँ धीरे-धीरे झनकीं। तभी एक नन्हा मूषक चमकीली गेंदे की माला लुढ़काता हुआ भीतर आया।

“बचाइए!” मूषक चीखा। गणपति जी झुककर उसकी बात सुनने लगे। मंदिर की घंटियाँ टन-टन बजती रहीं, और मूषक फुदकता हुआ फुसफुसाते जंगल की ओर दौड़ पड़ा।

मूषक उन्हें सूखी जलधारा तक ले गया। गाँव की ओर बहता पानी एक गिरी हुई डाल के पीछे अटका था। गणपति जी ने डाल उठाई, पर वह कड़कड़ाकर तीन टुकड़ों में टूट गई।

मूषक ने तीनों टुकड़े समेटे और जड़ों के पास चमकती लता की ओर इशारा किया। लता पर सुनहरी रोशनियाँ झिलमिला रही थीं। गणपति जी ने सोचा, “शायद यही रास्ता दिखाएगी।”

दोनों ने प्रकाशमान लता खींची। लता अचानक गाँठ बनाकर ऊपर उठी और दोनों को झूले की तरह हवा में झुलाने लगी। पत्तियाँ गोल-गोल घूमीं; गणपति जी धीमे से हँसे, तभी जड़ों के नीचे सुनहरा बीज चमका।

गणपति जी ने सुनहरा बीज मिट्टी में दबाया। मूषक ने पास की मिट्टी अपनी छोटी-सी थैली से झाड़ी। फिर गणपति जी ने बीज को धीरे से छुआ। एक पल को पूरा जलधारा-तट सुनहरी चमक से भर गया।

धड़ाम! एक फूलों वाला वृक्ष आकाश तक उठ गया। उसकी जड़ों ने पत्थरों को किनारे सरकाया, और साफ पानी चमकता हुआ गाँव की ओर दौड़ पड़ा। मूषक गीली मिट्टी पर फिसलता हुआ खुशी से चीखा, “छपाक!”

संध्या तक मंदिर का आँगन दीपों और गेंदे की मालाओं से जगमगा उठा। मूषक ने वेदी पर एक नन्हा फूल रखा। बहता पानी चमका, और गणपति जी तथा मूषक नए वृक्ष के नीचे बैठे रहे, जबकि शांत शाम में घंटियाँ बजती रहीं।